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प्रयागराज में होने वाले कुंभ महोत्सव को लेकर के रेलवे की तैयारी अब अंतिम चरण में है जिसके लिए रेलवे ने मार्ग दिग्दर्शिका भी जारी की है रेलवे के अनुसार पूरी रेल व्यवस्था मार्ग दीग्दर्शिका के अनुसार ही संचालित किए जाएंगे।


कुम्भ’ मूल शब्द ‘कुम्भक’ (अमृत का पवित्र घड़ा) से आया है। ऋग्वेद में ‘कुम्भ’ और उससे जुड़े स्नान अनुष्ठान का उल्लेख है। इसमें इस अवधि के दौरान संगम में स्नान करने से लाभ, नकारात्मक प्रभावों के उन्मूलन तथा

मन और आत्मा के कायाकल्प की बात कही गई है। अथर्ववेद और यजुर्वेद में भी ‘कुम्भ’ के लिए प्रार्थना लिखी गई है। इसमें बताया गया है कि कैसे

देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन से निकले अमृत के पवित्र घड़े (कुम्भ) को लेकर युद्ध हुआ। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने “मोहिनी” का रूप धारण कर कुम्भ को लालची राक्षसों के चंगुल से

छुड़ाया था। जब वह इसे स्वर्ग की ओर लेकर भागे तो अमृत की कुछ बूंदें चार पवित्र स्थलों पर गिरीं जिन्हें हम आज हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज के नाम से जानते हैं। इन्हीं चार स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष पर बारी-बारी से कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है।

कुम्भ मेला दुनिया में कहीं भी होने वाला सबसे बड़ा सार्वजनिक समागम और आस्था का सामूहिक आयोजन है। लगभग 45 दिनों तक चलने वाले इस मेले में लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और रहस्यमयी सरस्वती के पवित्र संगम पर स्नान करने के लिए आते हैं। मुख्य रूप से इस समागम में तपस्वी, संत, साधु, साध्वियाँ, कल्पवासी और सभी क्षेत्रों के तीर्थयात्री शामिल होते हैं।

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