65 एकड़ में विकसित होगा नानाजी देशमुख गोवंश संवर्धन एवं अनुसंधान प्रकल्प
पंतनगर। पंतनगर विश्वविद्यालय गोवंश संरक्षण और संवर्धन की दिशा में बड़ी पहल करने जा रहा है। विश्वविद्यालय परिसर में 65 एकड़ भूमि पर नानाजी देशमुख गोवंश संवर्धन एवं अनुसंधान प्रकल्प विकसित किया जाएगा। परियोजना को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। यह बात पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. शिवेंद्र कुमार कश्यप ने सोमवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कही।
कुलपति ने बताया कि प्रकल्प के दो प्रमुख पक्ष हैं—गोवंश संवर्धन और अनुसंधान। इसका उद्देश्य गोवंश से जुड़े लाभों को केवल सैद्धांतिक स्तर तक सीमित न रखते हुए उन्हें प्रयोगात्मक धरातल पर उतारना और एक टिकाऊ मॉडल विकसित करना है। सफल प्रयोगों को किसानों और समाज तक पहुंचाया जाएगा, ताकि गोवंश संरक्षण के साथ इससे जुड़ी आर्थिक संभावनाओं को भी बढ़ावा मिल सके।
उन्होंने बताया कि परियोजना के तहत गोबर और गोमूत्र सहित गोवंश से प्राप्त विभिन्न उत्पादों के उपयोग पर वैज्ञानिक शोध किया जाएगा। जैविक खाद, बायोगैस, वर्मी कंपोस्ट, ईंधन, प्राकृतिक पेंट, धूप-हवन सामग्री और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में प्रयोग किए जाएंगे। इसका उद्देश्य यह स्थापित करना है कि गोवंश से केवल दूध ही नहीं, बल्कि उसके अन्य उत्पादों के माध्यम से भी आर्थिक गतिविधियां और स्वरोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
कुलपति के अनुसार निराश्रित गोवंश की समस्या केवल पशुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे मानव जीवन भी प्रभावित होता है। सड़कों पर निराश्रित गोवंश के कारण दुर्घटनाओं की स्थिति बनती है, जिसमें पशुओं के साथ लोगों की जान भी जाती है। ऐसे में विश्वविद्यालय केवल पारंपरिक गौशाला स्थापित करने के बजाय इस समस्या को शोध और वैज्ञानिक समाधान के विषय के रूप में लेकर आगे बढ़ रहा है।
परियोजना के तहत गोवंश आधारित कृषि व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने की संभावनाओं पर भी काम होगा। गोबर, गोमूत्र और अन्य उप-उत्पादों से होने वाली आय के माध्यम से पशुपालन की लागत को पूरा करने की दिशा में प्रयोग किए जाएंगे। बायोगैस और उससे संबंधित ऊर्जा उत्पादन के बड़े मॉडल विकसित करने की भी योजना है। प्रथम चरण में विश्वविद्यालय को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने तथा इसके बाद जिले को आत्मनिर्भर बनाने की संभावनाओं पर काम किया जाएगा।
प्राकृतिक खेती पर भी होगा शोध
प्रकल्प में प्राकृतिक और जैविक खेती से जुड़े प्रयोगों के लिए वैज्ञानिक आंकड़े तैयार करने पर भी जोर रहेगा। माइक्रोबायोलॉजी, एग्रोनॉमी, मृदा विज्ञान, कृषि यंत्रीकरण, पशु चिकित्सा विज्ञान और एलपीएम सहित विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ इसमें अलग-अलग शोध परियोजनाओं के माध्यम से जुड़ेंगे। विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयास से गोवंश आधारित कृषि और टिकाऊ खेती का व्यावहारिक मॉडल तैयार करने का प्रयास किया जाएगा।
कुलपति ने बताया कि परियोजना को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के समक्ष प्रस्तुत किया गया है और प्रथम चरण में इसे स्वीकृति मिल चुकी है। नाबार्ड उत्तराखंड भी परियोजना के आधारभूत ढांचे के एक हिस्से के लिए सहयोग कर रहा है। इसके अलावा कई अन्य संस्थाओं ने भी परियोजना में सहयोग की इच्छा व्यक्त की है।
चरणबद्ध तरीके से विकसित होगा प्रकल्प
विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार परियोजना को चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जाएगा। जैसे-जैसे आधारभूत सुविधाओं का विस्तार होगा और नए शोध प्रकल्प जुड़ते जाएंगे, उनके परिणाम किसानों, विद्यार्थियों और समाज के सामने प्रस्तुत किए जाएंगे। उद्देश्य ऐसा मॉडल तैयार करना है, जिसे भविष्य में अन्य स्थानों पर भी अपनाया जा सके।
कुलपति ने कहा कि निराश्रित गोवंश की समस्या बड़ी है, लेकिन विश्वविद्यालय का प्रयास समस्या को केवल देखने के बजाय उसके समाधान का एक प्रभावी मॉडल विकसित करना है। इस परियोजना के माध्यम से गोवंश संरक्षण, प्राकृतिक खेती, ऊर्जा उत्पादन और स्वरोजगार को एक-दूसरे से जोड़कर दीर्घकालिक और टिकाऊ व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम किया जाएगा।
