कॉर्बेट के पास टेड़ा में एक ही पेड़ पर बैठे 20 से अधिक हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध, दुर्लभ नजारे ने खींचा ध्यान

रामनगर के जंगलों में गिद्धों की मौजूदगी से वन्यजीव प्रेमियों में उत्सुकता, रेडियो कॉलर और ड्रोन की मदद से हो रही गतिविधियों की निगरानी
रामनगर। कॉर्बेट के जंगलों के आसपास कभी बड़ी संख्या में दिखाई देने वाले गिद्ध अब कम नजर आते हैं। ऐसे में रामनगर वन प्रभाग के टेड़ा क्षेत्र में एक ही पेड़ पर 20 से अधिक हिमालयन ग्रिफॉन गिद्धों का एक साथ दिखाई देना वन्यजीव प्रेमियों और संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के लिए खास महत्व रखता है। गिद्धों के इस बड़े समूह ने एक बार फिर कॉर्बेट और आसपास के वन क्षेत्रों में इन पक्षियों की मौजूदगी, उनके प्राकृतिक आवास और संरक्षण के प्रयासों की ओर ध्यान आकर्षित किया है।
वन्यजीव फोटोग्राफर दीप रजवार के अनुसार, गिद्ध प्रकृति के सफाईकर्मी माने जाते हैं। वे मृत पशुओं के शवों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले कई दशकों में विभिन्न कारणों से गिद्धों की कई प्रजातियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में टेड़ा क्षेत्र में एक ही स्थान पर इतनी बड़ी संख्या में गिद्धों का नजर आना महत्वपूर्ण अवलोकन माना जा रहा है।
हालांकि, किसी एक स्थान पर गिद्धों का बड़ी संख्या में एकत्र होना उनकी कुल आबादी बढ़ने का प्रमाण नहीं है, लेकिन इससे उनके व्यवहार, विचरण क्षेत्र और स्थानीय पर्यावास के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी जुटाने का अवसर मिलता है।
डाइक्लोफेनाक दवा बनी थी गिद्धों की बड़ी दुश्मन
गिद्धों की घटती संख्या के प्रमुख कारणों में पशुओं के उपचार में इस्तेमाल होने वाली डाइक्लोफेनाक दवा को महत्वपूर्ण माना गया है। इस दवा से उपचारित पशुओं की मृत्यु के बाद उनके शव खाने वाले गिद्धों की किडनी खराब हो सकती है, जिससे उनकी मौत हो जाती है। गिद्धों की आबादी में गिरावट को देखते हुए पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया था। यह कदम गिद्ध संरक्षण की दिशा में अहम साबित हुआ।
विशेषज्ञों के अनुसार, गिद्धों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सुरक्षित भोजन की उपलब्धता, अनुकूल प्राकृतिक आवास और लगातार निगरानी बेहद जरूरी है। पक्षी विशेषज्ञों को याद है कि वर्ष 1980 के आसपास कॉर्बेट और आसपास के जंगलों में गिद्धों के बड़े समूह आसानी से दिखाई देते थे, लेकिन समय के साथ इनके दिखाई देने की घटनाएं कम होती गईं। कुछ वर्ष पहले तराई पश्चिमी वन प्रभाग के जंगलों में भी बड़ी संख्या में गिद्ध देखे जाने की जानकारी सामने आई थी।
रेडियो कॉलर से सामने आई गिद्धों की लंबी उड़ान
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में गिद्धों की गतिविधियों और उनके विचरण क्षेत्र को समझने के लिए कई वर्षों से अध्ययन किए जा रहे हैं। इसके तहत कुछ गिद्धों को रेडियो कॉलर लगाकर छोड़ा गया, ताकि उनकी आवाजाही पर नजर रखी जा सके। इस अध्ययन से पता चला कि कॉर्बेट क्षेत्र के गिद्ध देहरादून, उत्तर प्रदेश और नेपाल सीमा से लगे क्षेत्रों तक भी पहुंचते हैं।
रेडियो कॉलर से मिली जानकारी ने वन्यजीव विशेषज्ञों को इन पक्षियों के आवागमन, व्यवहार और उनके सामने आने वाली चुनौतियों को समझने में मदद की है। बिजली की तारें और प्लास्टिक कचरा भी वन्यजीवों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। वहीं, कॉर्बेट में ड्रोन की मदद से भी गिद्धों की निगरानी और संरक्षण संबंधी गतिविधियों में सहयोग लिया जा रहा है।
गिद्ध संरक्षण पर कॉर्बेट प्रशासन का विशेष जोर
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि कॉर्बेट और आसपास के क्षेत्रों में गिद्धों के संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध से गिद्ध संरक्षण को महत्वपूर्ण सहायता मिली है। रेडियो कॉलर के माध्यम से किए गए अध्ययनों से इन पक्षियों की आवाजाही, व्यवहार और उनके सामने मौजूद चुनौतियों को समझने में मदद मिली है।
पार्क प्रशासन गिद्धों के संरक्षण के साथ उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने पर भी विशेष ध्यान दे रहा है। टेड़ा क्षेत्र में एक ही पेड़ पर 20 से अधिक हिमालयन ग्रिफॉन गिद्धों का दिखाई देना इस बात को रेखांकित करता है कि वन क्षेत्रों में जैव विविधता के संरक्षण के लिए निरंतर निगरानी और दीर्घकालिक प्रयास आवश्यक हैं।
टेड़ा की यह घटना केवल एक दुर्लभ वन्यजीव दृश्य नहीं, बल्कि कॉर्बेट और तराई के जंगलों में गिद्धों के संरक्षण की जरूरत को सामने लाने वाला महत्वपूर्ण संकेत भी है।