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(बड़ी खबर)सिंधी समुदाय का पवित्र त्यौहार.चेटीचंड नव वर्ष के रूप में जाता है मनाया ।।


जानिए चेटीचंड की सही तारीख और इस दिन से जुड़ी खास बातें

चेटीचंड सिंधी समुदाय के महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक हैं। जिसे सिंधी समाज के लोग नववर्ष और संत झूलेलाल के जन्मोत्सव के रुप में मनाते हैं। इस साल सिंधी नववर्ष यानि चेटीचंड का पावन पर्व २० मार्च २०२६, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

सिंधी समुदाय के लोगों के लिए यह तिथि बेहद शुभ मानी जाती है। क्योंकि इस दिन से सिंधी हिंदुओं का नया साल शुरु होता हैं। हर नया महीना सिंधी हिंदुओं के पंचांग के अनुसार नए चांद के साथ प्रारंभहोता है इसलिए इस विशेष दिन को चेटी चंड भी कहा जाता हैं। इस दिन सिंधी समाज जल के देवता वरुण र की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

1 इस साल चेटीचंड कब मनाया जाएगा

पंचांग के अनुसार इस साल सिंधी नववर्ष यानि चेटीचंड का पावन पर्व चैत्र मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि यानि २० मार्च २०२६, शुक्रवार को मनाया जाएगा।

चेटीचंड की पूजा का शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार चेटीचंड की पूजा का शुभमुहूर्त इस दिन सायंकाल ०६.३२ से लेकर ०७.५९ बजे तक रहेगा। इसी दिन सिन्धियों के संरक्षक माने जाने वाले झूलेलाल देवता की जयंती मनाई जाएगी।

सिंधी समुदाय में चेटीचंड का क्या है महत्व

सिंधी समुदाय के लिए चेटीचंड बहुत महत्वपूर्ण । है। क्योंकि यह उनके नव वर्ष की शुरुआत होती है। चैत्र शुक्ल पक्ष की शुरुआत नए चंद्रमा से होती है। इस दिन को चेटीचंड कहा जाता है। बताया जाता है कि, यह दिन जलदेवता साई उदेरोलाल, जिन्हें झूलेलाल के नाम से भी जाना जाता है, के प्रति आस्था और उनके द्वारा सिंधी समुदाय की रक्षा करने – की याद में मनाया जाता है।

कहा जाता है कि जब एक दुष्ट राजा ने सिंधी संस्कृति और धर्म को नष्ट करने की कोशिश की,

तब जल देवता वरुण देव झूलेलाल के रुप में प्रकट हुए और समुदाय की रक्षा की। यही कारण है कि यह दिन श्रद्धा और कृतज्ञता का प्रतीक है।

चेटी चंड से जुड़ी रोचक बड़ी बातें

सिंधी धर्मगुरु के अनुसार, चेटीचंड का पर्व सिन्धी समाज के संरक्षक भगवान झूलेलाल के जन्मोत्सव के रुप में मनाया जाता है। संत झूलेलाल को वरुण देवता का अवतार माना जाता है। इस दिन सिंधी समाज जल के देवता वरुण की विशेष पूजा अर्चना करते है। चेटीचंड वाले दिन बहिराणा साहिब की परंपरा निभाई जाती है, जिसके तहत लोग एक

बर्तन में चीनी, फल, इलायची, सूखे मेवे, मिश्री और दीया जलाकर रखते हैं और उसे किसी पवित्र जल स्रोत जैसे झील या नदी आदि में जाकर विसर्जित करते है।

चेटीचंड पर्व से पूर्व सिंधी समाज से जुड़े लोग ४० दिनों का चालीहो व्रत करते हैं और सात्विक जीवन जीते हुए जमीन पर सोते है। चेटीचंड पर्व पर सिंधी समाज के लोग अपने घरों में विशेष रुप से मीठे चावल और छोले बनाते है। इस दिन लोगों को प्रसाद के रुप में मिश्री और मेवा बांटने की परंपरा भी निभाई जाती है।

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